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“फोल्डेबल छज्जा” की ‘निंजा टेक्निक’! नागौद के राजापुर स्कूल का जर्जर भवन सोशल मीडिया पर वायरल, 15 साल से उठ रहे सवाल

 



नागौद/सतना। सतना जिले के नागौद तहसील अंतर्गत ग्राम राजापुर स्थित शासकीय स्कूल भवन को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने सरकारी स्कूलों की व्यवस्था और निर्माण कार्यों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘हमारा गाँव, हमारा स्कूल, हमारी जिम्मेदारी’ शीर्षक से साझा किए जा रहे वीडियो में एक ग्रामीण स्कूल भवन की जर्जर स्थिति को दिखाते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में इसे “फोल्डेबल छज्जे की निंजा टेक्निक” बता रहा है।

वायरल वीडियो: ‘हमारा गाँव, हमारा स्कूल, हमारी जिम्मेदारी’ वायरल वीडियो



वीडियो में ग्रामीण का तंज सिर्फ भवन की खराब स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इस बात पर सवाल उठाता है कि यदि सरकारी स्कूल भवन लंबे समय से उपयोग के लायक नहीं है तो इसकी मरम्मत, पुनर्निर्माण अथवा जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई।

हालांकि, भवन निर्माण में भ्रष्टाचार अथवा घटिया सामग्री के इस्तेमाल की पुष्टि किसी आधिकारिक जांच रिपोर्ट से अभी सामने नहीं आई है। इसलिए वायरल वीडियो में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र और तकनीकी जांच होना जरूरी है।

राजापुर स्कूल का भवन बना सबसे बड़ा सवाल

ग्रामीणों से मिली जानकारी और वायरल वीडियो के अनुसार राजापुर का यह शासकीय विद्यालय भवन करीब वर्ष 2011 में बनाया गया था। दावा है कि निर्माण के बाद भवन का छज्जा अथवा छत का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और इसके बाद भवन का नियमित शैक्षणिक उपयोग नहीं हो सका।

ग्रामीणों का आरोप है कि करीब 15 वर्षों से भवन की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। यदि यह दावा सही है तो यह केवल एक जर्जर भवन का मामला नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति के रखरखाव, निर्माण की गुणवत्ता और शिक्षा व्यवस्था की निगरानी से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि भवन वास्तव में निर्माण के शुरुआती दौर में ही क्षतिग्रस्त हो गया था, तो संबंधित विभागीय अधिकारियों ने इसकी तकनीकी जांच क्यों नहीं कराई? निर्माण की गुणवत्ता की जांच हुई थी या नहीं? यदि हुई थी तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है?

“फोल्डेबल छज्जा” कहकर ग्रामीण ने कसा तंज

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का सबसे ज्यादा चर्चा में आया हिस्सा ग्रामीण का नन्दलाल पाण्डेय 'नंदु' व्यंग्यात्मक अंदाज है। स्कूल भवन के क्षतिग्रस्त हिस्से को दिखाते हुए वह इसे सामान्य निर्माण के बजाय “फोल्डेबल छज्जे की आधुनिक निंजा टेक्निक” बताकर व्यवस्था पर कटाक्ष करता दिखाई देता है।

ग्रामीण की यह भाषा भले ही व्यंग्यात्मक हो, लेकिन इसके पीछे उठाया गया सवाल गंभीर है—सरकारी धन से बनाए गए किसी भवन की उपयोगिता कितने समय तक सुनिश्चित हुई और उसके खराब होने की जिम्मेदारी किसकी थी?

सोशल मीडिया वीडियो अपने आप में किसी आरोप का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन यह प्रशासन के लिए मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करने का आधार जरूर बन सकता है।

आठ कक्षाओं की जिम्मेदारी दो शिक्षकों पर होने का दावाग्रामीणों द्वारा स्कूल की शैक्षणिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कक्षा 1 से 8 तक संचालित इस स्कूल में कथित तौर पर केवल दो शिक्षक जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

वहीं ग्रामीणों का दावा है कि स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या भी बेहद कम रह गई है और अलग-अलग कक्षाओं को मिलाकर करीब 10 से 15 बच्चे ही दिखाई देते हैं।

इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड से होना आवश्यक है। यदि विद्यालय में वास्तव में नामांकन और वास्तविक उपस्थिति के बीच बड़ा अंतर है, तो उसके कारणों की पड़ताल भी जरूरी होगी।

स्कूल भवन की खराब स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता, विद्यार्थियों की उपस्थिति और बुनियादी सुविधाएं—ये सभी बातें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। किसी गांव में सरकारी स्कूल कमजोर होता है तो उसका सीधा असर बच्चों के शिक्षा अधिकार और अभिभावकों के भरोसे पर पड़ता है।

RTE के मानकों में स्कूल भवन को लेकर स्पष्ट प्रावधान

शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार Right to Education Act के तहत स्कूल भवन के लिए निर्धारित मानकों में ऑल-वेदर बिल्डिंग, कक्षाओं की पर्याप्त व्यवस्था, बाधारहित पहुंच, अलग-अलग शौचालय और सुरक्षित पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं शामिल हैं।

स्कूल सुरक्षा संबंधी केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश भी भवन की सुरक्षा, भवन कोड के अनुपालन, सुरक्षित पेयजल, शौचालय और अन्य बुनियादी सुरक्षा उपायों पर जोर देते हैं।

इस लिहाज से राजापुर स्कूल भवन की स्थिति की वास्तविक तकनीकी जांच केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

आधिकारिक जानकारी: भारत सरकार का RTE Act पोर्टल

15 साल से बंद भवन पर अब कौन देगा जवाब?

ग्रामीणों की ओर से सबसे बड़ा सवाल यही उठाया जा रहा है कि यदि वर्ष 2011 के आसपास बना भवन लंबे समय से उपयोग में नहीं है तो उसकी वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई?

क्या निर्माण एजेंसी ने काम पूरा करने के बाद भवन का हैंडओवर किया था?
क्या भवन की तकनीकी गुणवत्ता का परीक्षण हुआ था?
क्या किसी अधिकारी ने भवन के क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट तैयार की?
क्या मरम्मत या पुनर्निर्माण के लिए कोई प्रस्ताव भेजा गया?
क्या संबंधित निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय की गई?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और आधिकारिक जांच से ही सामने आ सकते हैं।

सरकारी स्कूल बचाने की चुनौती केवल भवन तक सीमित नहीं

मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या और उनकी स्थिति को लेकर लगातार बहस होती रही है। लेकिन यह कहना कि राज्य में “सबसे ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हुए हैं”, बिना संबंधित वर्ष और आधिकारिक आंकड़ों के, इस खबर में तथ्य के रूप में लिखना उचित नहीं होगा।

UDISE+ 2024-25 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में कुल 1,22,120 स्कूल दर्ज हैं।

इसलिए व्यापक दावा करने के बजाय राजापुर जैसे स्थानीय मामलों पर तथ्य आधारित निगरानी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई स्कूल भवन अनुपयोगी है, विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है या बुनियादी सुविधाओं में कमी है, तो उसका कारण समझना और समाधान करना जरूरी है।

सरकारी स्कूल केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होता। वह ग्रामीण परिवारों के बच्चों की शिक्षा का सबसे सुलभ माध्यम होता है। इसलिए किसी स्कूल भवन का वर्षों तक अनुपयोगी रहना अपने आप में प्रशासनिक समीक्षा का विषय होना चाहिए।

ग्रामीणों ने जांच और कार्रवाई की मांग उठाई

वायरल वीडियो के बाद ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों की ओर से पूरे मामले की जांच कराने की मांग उठाई जा रही है। मांग है कि प्रशासन मौके का निरीक्षण कर भवन की वर्तमान स्थिति का पंचनामा तैयार करे और जरूरत पड़ने पर तकनीकी टीम से निर्माण की गुणवत्ता की जांच कराई जाए।

यदि जांच में निर्माण संबंधी अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमों के अनुसार जिम्मेदार व्यक्तियों अथवा एजेंसी के विरुद्ध कार्रवाई और सरकारी नुकसान की वसूली पर निर्णय लिया जा सकता है।

वहीं यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो प्रशासन को इसकी स्थिति भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए। यही प्रक्रिया इस मामले को सोशल मीडिया के आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर तथ्य आधारित जांच तक ले जा सकती है।

CM Helpline पर दर्ज हो सकती है स्कूल भवन संबंधी शिकायत

मध्यप्रदेश की CM Helpline व्यवस्था में नागरिक सरकारी विभागों से संबंधित शिकायत, मांग और सुझाव दर्ज करा सकते हैं। आधिकारिक पोर्टल के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़ी शिकायतें भी इस व्यवस्था के माध्यम से दर्ज की जा सकती हैं।

CM Helpline के उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों में भवन निर्माण, स्वच्छ पानी, साफ-सफाई और शौचालय से संबंधित शिकायतों की श्रेणी भी दर्ज है।

राजापुर स्कूल की स्थिति को लेकर यदि कोई नागरिक शिकायत दर्ज कराना चाहता है तो वह संबंधित दस्तावेज, फोटो और वीडियो प्रमाण के साथ शिकायत कर सकता है।

शिकायत दर्ज करने के लिए: मध्यप्रदेश CM Helpline शिकायत पोर्टल
CM Helpline: 181

वायरल वीडियो ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया

राजापुर के स्कूल भवन को लेकर वायरल हुआ वीडियो भले ही व्यंग्य और तंज के अंदाज में बनाया गया हो, लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण सवाल सार्वजनिक बहस में ला दिया है—सरकारी स्कूलों की इमारतें बनने के बाद उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता की जिम्मेदारी आखिर कौन सुनिश्चित करेगा?

“हमारा गाँव, हमारा स्कूल, हमारी जिम्मेदारी” का संदेश इसी वजह से महत्वपूर्ण हो जाता है। स्कूल की निगरानी केवल सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती; ग्रामीणों, अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन की सतर्कता भी जरूरी है। लेकिन शिकायत सामने आने के बाद अंतिम जिम्मेदारी प्रशासन की है कि वह आरोपों की निष्पक्ष जांच कर तथ्य सामने रखे।

राजापुर के मामले में अब नजर इस बात पर रहेगी कि प्रशासन वायरल वीडियो को केवल सोशल मीडिया की एक पोस्ट मानकर छोड़ता है या मौके पर जांच कर भवन के निर्माण, वर्तमान स्थिति और जिम्मेदारी से जुड़े सवालों का आधिकारिक जवाब देता है।



सतना समाचार, नागौद समाचार, मध्यप्रदेश शिक्षा समाचार या सरकारी स्कूलों 



राजापुर स्कूल का मामला अब केवल एक जर्जर छज्जे की तस्वीर नहीं रह गया है। यह सरकारी निर्माण, स्कूल भवन की सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कई सवालों का मामला बन चुका है। वायरल वीडियो ने सवाल जरूर उठाए हैं, लेकिन अंतिम सच जांच से ही सामने आएगा।

जरूरत अब बयानबाजी की नहीं, मौके के निरीक्षण, तकनीकी जांच और स्पष्ट जवाबदेही की है। यदि भवन में वास्तव में निर्माण संबंधी खामियां थीं तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि आरोप सही नहीं हैं तो प्रशासन को तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए।

जब पत्रकारिता खामोश हो, तो जनता की आवाज बनते हैं नंदलाल पांडेय जैसे युवा

जब पत्रकार जनसरोकार के मुद्दों से अपना मुंह मोड़ लेते हैं और जमीनी समस्याओं की आवाज जिम्मेदारों तक पहुंचना बंद हो जाती है, तब नंदलाल पांडेय जैसे युवा सामने आते हैं। वे अपने तरीके से उन सवालों को उठाते हैं, जिन्हें शायद व्यवस्था लंबे समय से नजरअंदाज करती आ रही है।

राजापुर के सरकारी स्कूल की बदहाल स्थिति को लेकर बनाया गया यह वीडियो भी इसी जनसरोकार की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। व्यंग्य और तंज के माध्यम से नंदलाल पांडेय ने न केवल स्कूल भवन की स्थिति सामने रखी, बल्कि शासन और प्रशासन से यह सवाल भी पूछा है कि आखिर इतने वर्षों तक इस समस्या पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया।

लोकतंत्र में पत्रकारिता का मूल उद्देश्य भी यही है कि जनता की समस्याओं और सवालों को जिम्मेदारों तक पहुंचाया जाए। लेकिन जब यह भूमिका कमजोर पड़ती है, तब सोशल मीडिया आम नागरिकों के लिए अपनी आवाज उठाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।

अब देखना यह होगा कि नंदलाल पांडेय के इस वायरल वीडियो का असर प्रशासन पर कितना होता है। क्या जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्कूल भवन की स्थिति की जांच करेंगे? क्या निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होगी? या फिर यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर कुछ दिनों की चर्चा के बाद बाकी मुद्दों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

फिलहाल राजापुर के ग्रामीणों और बच्चों से जुड़े इस सवाल का जवाब प्रशासन के अगले कदम में छिपा है।

Written & Edited By : ADIL AZIZ
(जनहित की बात, पत्रकारिता के साथ)
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Email: publicnewsviews1@gmail.com

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